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एक दिहाड़ी पर काम करने वाली मजदूर औरत की कहानी, उसकी ज़ुबानी, जो अभी के हालात समझ नहीं
पा रही है। जिसकी ज़िन्दगी वैसे ही जुझारू और किस तरह से लॉकडॉउन की वजह से उसे और तकलीफ झेलनी पड़ती है। उसके पास इसका कोई उपाय नहीं है, पर बस एक सवाल है कि – क्यों आयी हो महामारी ?

लॉकडाउन के फ़रमान जारी,
सर पर मेरे है – बेकारी,
खत्म हो गई पूंजि सारी,
क्यों आयी हो महामारी?

वैसे भी तो लड़-झगड़ कर,
हासिल की मैंने दिहाड़ी,
नाकाबंदी करके तुमने,
छीनी मेरी हिस्सेदारी,
दिन रात मैं कोसुं तुमको,
क्यों आयी हो महामारी?

भाड़ा ना भर पाने पर,
अब मैं अपना घर हूं हारी,
बच्चे भूके हैं पर चुप हैं,
कब तक रखेंगे दिल ये भारी,
कटे पेट को काट रही हो,
क्यों आयी हो महामारी?

सोचा मैंने पगार की अब,
मालिक से कुछ बात करूं मैं,
अठारह दिन की ही सही और..
और बाकी कुछ उधार करूं मैं,
फोन की घंटी बजना जारी,
बैटरी भी अब खत्म है सारी,
सोचा के घर ही मिल आऊं ,
शायद मिलकर सुने गुहारी,
चप्पल डाल कर निकल पड़ी मैं,
खाली है अब सड़के सारी,
पूछ रहा है कोना कोना,
पूछ रही है डाली डाली,
क्यों आयी हो महामारी?

राजू खड़ा सिक्योरिटी पर है,
चिल्ला मुझ पर रहा बिहारी-
“हाथ धो, पहनो मास्क पहले!”,
फिर सुनेंगे बात तुम्हारी।
मेडिकल से मास्क खरीदा,
राजू से अब सौ की उधारी,
बोला चले जाओ अब उपर,
साहब की अभी आयी है गाड़ी।

मालिक मिले तो चीख उठे वो,
गाली सुनाई खारी खारी,
बोले खर्चा क्या है तुम्हारा,
नुकसान ‘उन्हें ‘ हुआ है भारी,
पांच सौ का नोट थमाकर
खत्म की हिसाब की बारी,
हाथ जोड़ कर बोले वे अब,
“होग्यी तुम्हारी छुट्टी जारी!”
सिगरेट के कश फूंक फूंक कर,
पूछने की थी उनकी बारी,
क्यों आयी हो महामारी?

राशन की कुछ हुई खरीदी
अब बच्चे चैन से सोए हैं,
पता नहीं है उन्हें – अभी तक,
हम ‘घर’ और ‘बिस्तर’ खोए हैं!
नींद अभी आंखो में शायद,
मेरे हिस्से नहीं आएगी,
बस दो दिन और भूक नपेगी,
महामारी तू कब जाएगी?

बोरी बिस्तर बांध के मैंने
की है पूरी तय्यारी
बच्चो को भी बांध लिया है
गठरी – रोटी संग शुरू सवारी,
गांव मेरा कुछ कोस दूर है,
सरकार ने मदद की हमारी
बोले के चड़ जाओ बस में,
टिकट करा लो मुफ्त में जारी
धककामुकी पूछ रही है,
क्यों आयी हो महामारी?

सात घंटे बाद हूं पोहुंची,
बापू के मिट्टी के घर,
सामान तो सब पहुंच गया पर..
पर मोडा- पसीना में तरबतर,
छींक – खास के लल्ला मेरा,
बुखार से बेहाल है,
ठंडी पट्टी लगी भिगो कर
माथा अब भी लाल है,

घुटने टेक दिए है मैंने
लल्ला की सांसे है भारी,
वैद्य ने दिए अनेक नुस्खे,
व्यर्थ हुई सारी कलाकारी,
पूछ पूछ कर थक गई हूं अब,
सुनलो अरजी मेरी मुरारी,
कब जाएगी महामारी?
कब जाएगी महामारी?

— अश्वनी आचार्य


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